लखीमपुर मेडिकल कॉलेज का ‘मेडिकल कमाल’: 17 साल के आदर्श के फेफड़ों में कई जगह भरा था मवाद, बिना बड़े ऑपरेशन डॉक्टरों ने दी नई जिंदगी
फेफड़ों की मल्टीपल झिल्लियों में जमा मवाद को दो सिटिंग में किया ड्रेन, चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. अंशुल गुप्ता और डॉ. अरविंद दीक्षित की टीम को मिली बड़ी सफलता; डॉक्टरों ने तकनीक को बताया ‘लाइफ सेविंग’

सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द और लगातार खांसी से जूझ रहा था महज 17 साल का आदर्श। जांच हुई तो फेफड़ों में ऐसी गंभीर स्थिति सामने आई जिसने डॉक्टरों के सामने भी चुनौती खड़ी कर दी। फेफड़ों में मवाद एक जगह नहीं, बल्कि कई अलग-अलग झिल्लियों में जमा था। बड़े ऑपरेशन के जोखिम को देखते हुए लखीमपुर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने अलग रास्ता चुना—और दो सिटिंग में बिना बड़े ऑपरेशन के मवाद ड्रेन कर किशोर को नई जिंदगी दे दी।
लखीमपुर खीरी। मेडिकल कॉलेज लखीमपुर खीरी के डॉक्टरों ने 17 वर्षीय किशोर के फेफड़ों में गंभीर संक्रमण का जटिल इलाज कर बड़ी सफलता हासिल की है। फेफड़ों की कई अलग-अलग झिल्लियों में मवाद जमा होने के बावजूद डॉक्टरों ने बड़े ऑपरेशन की जगह ड्रेनेज तकनीक का इस्तेमाल किया। दो सिटिंग में मवाद को बाहर निकालने के बाद किशोर अब स्वस्थ है और सामान्य जिंदगी जी रहा है।
चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. अंशुल गुप्ता के मुताबिक 17 वर्षीय आदर्श सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द और खांसी की शिकायत लेकर मेडिकल कॉलेज की ओपीडी पहुंचा था। शुरुआती जांच में उसके फेफड़ों में पानी होने की बात सामने आई, लेकिन आगे की जांच में स्थिति ज्यादा गंभीर मिली।
डॉक्टरों ने पाया कि फेफड़ों में मवाद एक स्थान पर जमा नहीं था, बल्कि मल्टीपल झिल्लियों में अलग-अलग जगह मौजूद था। यह गंभीर संक्रमण की ओर इशारा कर रहा था। मरीज की कम उम्र को देखते हुए डॉक्टरों के सामने इलाज को लेकर बड़ी चुनौती थी।
डॉ. अंशुल गुप्ता के मुताबिक बड़े ऑपरेशन की स्थिति में कई तरह की जटिलताओं का खतरा हो सकता था। इसके बाद उन्होंने डॉ. अरविंद दीक्षित के साथ मिलकर मवाद को ड्रेन करके बाहर निकालने की योजना तैयार की।
इसके लिए मेडिकल टीम ने पूरा सेटअप तैयार किया और बेहद सावधानी के साथ प्रक्रिया शुरू की। डॉक्टरों के अनुसार दो सिटिंग में अलग-अलग झिल्लियों में जमा मवाद को सफलतापूर्वक ड्रेन कर बाहर निकाल दिया गया।
इलाज सफल होने के बाद आदर्श की स्थिति में सुधार हुआ और अब वह सामान्य जीवन जी रहा है। डॉ. अंशुल गुप्ता का कहना है कि यह तकनीक चुनौतीपूर्ण जरूर थी, लेकिन सावधानी और सही प्लानिंग के साथ इसे सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
डॉक्टरों का मानना है कि उपयुक्त मरीजों में इस तरह की तकनीक बड़े ऑपरेशन और उससे जुड़े जोखिम को कम करने में मददगार साबित हो सकती है। साथ ही लंबे इलाज और खर्च से भी मरीज को राहत मिल सकती है।
मेडिकल टीम इसे ‘लाइफ सेविंग’ तकनीक और लखीमपुर मेडिकल कॉलेज की महत्वपूर्ण उपलब्धि बता रही है। डॉक्टरों की ओर से इसे अपनी तरह का बेहद महत्वपूर्ण मामला बताया जा रहा है। हालांकि “देश में पहली बार” होने के दावे की स्वतंत्र चिकित्सा स्तर पर पुष्टि होना बाकी है।



