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हर मौसम में खबरों की दस्तक देने वाले ओम प्रकाश दीक्षित नहीं रहे, गोला की गलियों में छोड़ गए अपनों की यादें

करीब पांच दशक तक सर्दी, गर्मी और बरसात में लोगों के घर-घर खबरें पहुंचाने वाले ओम प्रकाश दीक्षित के निधन से गोला गोकर्णनाथ में शोक की लहर, अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब।

हर सुबह जब लोग अपने दरवाजे पर अखबार उठाते थे, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वह अखबार पहुंचाने वाला चेहरा एक दिन यूं हमेशा के लिए ओझल हो जाएगा।
गोला गोकर्णनाथ की गलियों में वर्षों तक खबरों की दस्तक देने वाले ओम प्रकाश दीक्षित अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन उनकी मेहनत, मुस्कान और लोगों से बना रिश्ता हमेशा याद रखा जाएगा।
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लखीमपुर खीरी (गोला गोकर्णनाथ)। कुछ लोग अपने पीछे केवल यादें छोड़ते हैं, लेकिन कुछ लोग अपने जीवन से एक ऐसी पहचान बना जाते हैं, जिसे समय भी मिटा नहीं पाता। गोला गोकर्णनाथ नगर के पीलीभीत धर्मशाला निवासी और वर्षों तक घर-घर अखबार पहुंचाने वाले ओम प्रकाश दीक्षित (75) अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर जैसे ही नगर में फैली, हर उस व्यक्ति की आंखें नम हो गईं, जिसकी सुबह कभी उनके हाथों से पहुंचे अखबार के साथ शुरू होती थी।
मूल रूप से ग्राम सौंखिया निवासी ओम प्रकाश दीक्षित ने विवाह नहीं किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाचार पत्र वितरण के कार्य को समर्पित कर दिया। यह उनके लिए केवल रोजगार नहीं था, बल्कि समाज को सूचना और जागरूकता से जोड़ने का एक मिशन था। जब पूरा शहर सो रहा होता था, तब वह अपनी साइकिल या अन्य साधन से अखबार लेकर निकल पड़ते थे, ताकि लोगों तक समय पर खबरें पहुंच सकें।
सर्दियों की कड़ाके की ठंड हो, तपती गर्मी हो या मूसलाधार बारिश—ओम प्रकाश दीक्षित की दिनचर्या कभी नहीं बदली। मौसम चाहे जैसा भी रहा हो, उनके कदम नहीं रुके। समय की पाबंदी और जिम्मेदारी के कारण नगर के लोग उन पर पूरा भरोसा करते थे। कई परिवारों के लिए वह सिर्फ अखबार बांटने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य जैसे बन चुके थे।
जो बच्चे कभी उनके हाथों से अखबार लेते थे, आज वे बड़े हो चुके हैं। कई बुजुर्ग बताते हैं कि दशकों तक सुबह दरवाजा खुलते ही सबसे पहले ओम प्रकाश दीक्षित की आवाज या उनकी साइकिल की आहट सुनाई देती थी। यही रिश्ता उन्हें नगर का अपना और सम्मानित चेहरा बनाता था।
पिछले करीब एक माह से वह अस्वस्थ चल रहे थे। शुक्रवार को उनके निधन की सूचना मिलते ही पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, व्यापारियों और नगर के प्रबुद्ध नागरिकों में शोक की लहर दौड़ गई। हर किसी के पास उनसे जुड़ी कोई न कोई याद थी—किसी ने उनकी ईमानदारी को याद किया, तो किसी ने उनकी सादगी और सहज व्यवहार को।
उनकी अंतिम यात्रा में पालिकाध्यक्ष समेत बड़ी संख्या में नगरवासी शामिल हुए और नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि रिश्ते केवल खून से नहीं बनते, बल्कि वर्षों की सेवा, विश्वास और अपनत्व से भी बनते हैं।
ओम प्रकाश दीक्षित अब भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हर सुबह जब किसी घर का दरवाजा खुलेगा और अखबार हाथ में आएगा, तो बहुत से लोगों को उनकी कमी जरूर महसूस होगी। उन्होंने अपना जीवन खबरों को लोगों तक पहुंचाने में बिताया और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान और सबसे बड़ी विरासत है। उनकी सादगी, कर्मनिष्ठा और समाज के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🌹

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