राजनीतिलखीमपुर खीरी

“मनोज भारती जेल में… लेकिन 2027 के खेल में सबसे आगे कौन? क्या फिर रोमी साहनी ही साबित होंगे राजनीति के धुरंधर?”

बांकेगंज विवाद, गिरफ्तारी और बदलते समीकरणों के बीच पलिया की राजनीति में बढ़ा सस्पेंस, दलित वोट बैंक पर टिकी सबकी नजर

एक तरफ आंदोलन, गिरफ्तारी और सहानुभूति की राजनीति है, दूसरी तरफ जनसंपर्क, संगठन और वर्षों से बनाई गई ‘रॉबिन हुड’ की छवि। 2027 के महासंग्राम से पहले पलिया की राजनीति में कौन चला सबसे बड़ी चाल?

लखीमपुर खीरी की पलिया विधानसभा की राजनीति में पिछले कुछ महीनों में जो घटनाक्रम सामने आए हैं, उन्होंने 2027 के विधानसभा चुनाव की पटकथा को और दिलचस्प बना दिया है। बांकेगंज में डॉ. भीमराव आंबेडकर प्रतिमा प्रकरण से शुरू हुई राजनीतिक तल्खी ने विधायक रोमी साहनी और दलित पैंथर पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक मनोज कुमार भारती के बीच सीधी सियासी लड़ाई का रूप ले लिया।
लेकिन 17 जून को हुए घटनाक्रम ने पूरी कहानी में नया मोड़ ला दिया। खीरी पुलिस ने मनोज कुमार भारती को वर्ष 2016 के एक मामले में जारी गैर जमानती वारंट और वर्ष 2025 में दर्ज रंगदारी व धमकी के मामले में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया। अदालत से राहत न मिलने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। हालांकि इन मामलों में अंतिम निर्णय न्यायालय के अधीन है।
 क्या गिरफ्तारी से बदलेगा पूरा राजनीतिक गणित?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि किसी भी नेता की गिरफ्तारी दो तरह के परिणाम पैदा करती है। पहला, समर्थकों के बीच सहानुभूति का माहौल बनता है। दूसरा, विरोधी खेमे को यह कहने का मौका मिलता है कि जनता विकास और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता देती है।
यहीं से रोमी साहनी की राजनीति की चर्चा शुरू होती है।
आखिर क्यों अलग दिखाई देते हैं रोमी साहनी?
पलिया की राजनीति में रोमी साहनी का सफर केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं माना जाता। समर्थक उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर हर वर्ग में अपनी पैठ बनाए हुए हैं। गरीबों की आर्थिक मदद, जरूरतमंद परिवारों की सहायता, इलाज से लेकर शिक्षा तक व्यक्तिगत हस्तक्षेप और प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता ने उन्हें एक अलग पहचान दी है।
यही वजह है कि विरोधी दलों की ओर से लगातार राजनीतिक घेराबंदी के बावजूद उनका जनाधार कमजोर पड़ता नहीं दिखाई देता।
बांकेगंज विवाद में किसने खेली लंबी पारी?
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बांकेगंज विवाद के बाद जिस तरह से सियासी माहौल गर्म हुआ, उससे यह माना जा रहा था कि दलित राजनीति का एक नया चेहरा तेजी से उभर सकता है। लेकिन घटनाक्रम के आगे बढ़ने के साथ समीकरण बदलते चले गए।
मनोज भारती लगातार आक्रामक तेवरों के कारण सुर्खियों में रहे, जबकि रोमी साहनी अपेक्षाकृत शांत रहकर संगठन और समर्थकों को संभालते रहे। यही शैली उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है।
रोमी साहनी की राजनीति की पांच बड़ी ताकत
✔ वर्षों से बना मजबूत व्यक्तिगत जनसंपर्क।
✔ दलित, पिछड़े और सामान्य वर्ग में स्वीकार्यता।
✔ कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मजबूत नेटवर्क।
✔ मददगार और “रॉबिन हुड” जैसी स्थापित छवि।
✔ विवादों से ज्यादा जनता के बीच सक्रिय रहने की रणनीति।
2027 में सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित वोट बैंक 2027 में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। अगर मनोज भारती सहानुभूति की राजनीति को मजबूत संगठन में बदलने में सफल होते हैं तो वह चुनौती पेश कर सकते हैं।
लेकिन दूसरी ओर रोमी साहनी का अनुभव, लगातार चुनावी सफलता और क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत पकड़ उन्हें मजबूत स्थिति में खड़ा करती है।
सबसे बड़ा सस्पेंस अभी बाकी है…
क्या मनोज भारती की गिरफ्तारी उन्हें नया राजनीतिक कद देगी?
क्या दलित राजनीति में नया चेहरा उभरेगा?
या फिर हर बार की तरह रोमी साहनी अपने अनुभव, संगठन और जनाधार के दम पर विरोधियों की चालों को मात देकर 2027 में भी खुद को पलिया की राजनीति का सबसे बड़ा धुरंधर साबित करेंगे?
फिलहाल इतना तय है कि पलिया की राजनीति का अगला अध्याय बेहद दिलचस्प होने वाला है, और सबसे बड़ा फैसला अब जनता के हाथ में है।

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